सुन्दर त्वचा के लिए आयुर्वेदिक निर्देश

सुन्दर त्वचा के लिए आयुर्वेदिक निर्देश

आयुर्वेद में त्वचा की कील-मुंहासो, आँखों के नीचे के काले घेरे, झुर्रियों तथा दाग से रक्षा करने और गोरा बनाने की विधियों का उल्लेख किया गया है. homemade beauty tips for glowing skin in hindi

दमकती त्वचा के लिए आयुर्वेदिक घरेलू नुस्खे (हिंदी में)

Read this article in English An Ayurveda Guide for Beautiful Skin

प्राकृतिक रूप से ताज़गी भरी और स्वस्थ्य त्वचा ना केवल शरीर की रक्षक है अपितु वह सुन्दरता भी बढ़ाती है. हमारे प्राचीन औषधी शास्त्र आयुर्वेद में हमारी त्वचा की कील-मुंहासो, आँखों के नीचे के काले घेरे, झुर्रियों तथा मुंहासो के दाग से रक्षा करने और गोरा बनाने की प्राकृतिक और हर्बल विधियों का उल्लेख किया गया है. कील-मुंहासें, काले घेरे, झुर्रियाँ और निशान हमें बुझा-बुझा सा और अस्वस्थ रूप प्रदान करते हैं. यहाँ पर प्राकृतिक रूप से ताज़गी भरी, गोरी और दमकती त्वचा के लिए हर्बल उपाय बताये गए है.

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त्वचा की संरचना

त्वचा पर परिवर्तन लाने वाले कारकों का अध्ययन करने से पूर्व हमें त्वचा की संरचना के बारे में जानना आवश्यक है. त्वचा का निर्माण एपिथीलीयल उत्तक की बहुत सी परतों से होता है. त्वचा की सूक्ष्मदर्शीय काट में दो अलग-अलग भाग दिखाई देते हैं. एपीडर्मिस इसकी सबसे उपरी परत होती है. एपिडर्मिस की ऊपरी परत में मृत कोशिकाएं होती हैं, जो धीरे-धीरे हटती रहती है. साथ ही इन कोशिकाओं का स्थान नयी कोशिकाएं लेती रहती हैं. एपिडर्मिस की निचली परत बेसल परत के द्वारा उत्पन्न होती है.

एपिडर्मिस के नीचे डर्मिस परत होती है, जिसमें कोलेजन तंतुओ का जाल होता है. यह कोलेजन तंतु ही त्वचा की तन्यता के लिए उत्तरदायी होते हैं. सीबेसियस ग्रंथियां जो रोम कूपों और स्वेद ग्रंथियों से जुड़ी होती हैं, वह भी डर्मिस में ही उपस्थित होती हैं और डर्मिस के नीचे उपस्थित सबक्युटेनियस उत्तकों से रक्त की आपूर्ति प्राप्त करती हैं. सीबेसियस ग्रंथियां तरुणाई के समय क्रियाशील हो जाती हैं और एक तैलीय पदार्थ का स्त्रावण करती है जिसे सीबम कहते है.

आयुर्वेद में त्वचा की संरचना

आयुर्वेद में सुश्रुताचार्य के अनुसार त्वचा में सात परत होती हैं. जब इन परतों पर असंतुलित दोषों (शरीर की ऊर्जा के जैविक स्त्रोत) का प्रभाव पड़ता है तो उसके परिणामस्वरूप त्वचा के विभिन्न रोग होते हैं. त्वचा की सात परतो के नाम और उनसे सम्बंधित रोगों की सूची नीचे दी गयी है.

अवभासीनी –

यह त्वचा की सबसे बाहरी परत है. जब यह परत विकृत दोष से प्रभावित होती है तब कील-मुंहासे, और रूसी की समस्या उत्पन्न होती है.

लोहिता –

यह त्वचा की दूसरी परत है. जब यह परत विकृत दोषों से प्रभावित होती है तो मस्से, काले घेरे , काली व्यंग (झाइयां) आदि समस्याएँ उत्पन्न  होती हैं.

श्वेत –

यह त्वचा की तीसरी परत होती है. जब यह परत विकृत दोषों से प्रभावित होती है तो एक्जिमा, एलर्जी दाने आदि जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं.

ताम्र –

यह त्वचा की चौथी परत है. जब यह दोषों से प्रभावित होती है तो विविध प्रकार के कुष्ठ रोग होते हैं.

वेदिनी –

यह पांचवी परत है जब इस पर विकृत दोष प्रभाव डालते हैं तब हर्पिस रोग होता है.

रोहिणी –

जब इस परत पर विकृत दोष प्रभाव डालते हैं तब कैंसर, गांठें, हाथीपांव आदि जैसे रोग उत्पन्न होते हैं.

मम्सधरा –

यह सातवीं परत है. जब यह विकृत दोषों से प्रभावित होती है तब व्रण और फिस्टुला आदि उत्पन्न होते हैं.

त्वचा के कार्य

यह आतंरिक मांसपेशियों और उत्तकों को आवरण प्रदान करती है. यह हमारे शरीर में रोगाणुओं के प्रवेश को रोकती है, तापावरोधन का कार्य करती है, शरीर के तापमान का नियंत्रण करती है, और यह एक मुख्य संवेदी अंग है. यह विटामिन डी के संश्लेषण में मुख्य भूमिका निभाती है.

त्वचा का मेलेनिन नामक रंजक हमें सूर्य की परबैंगनी किरणों से बचाता है.

त्वचा की सुन्दरता को क्या नष्ट करता है ?

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सूर्य:

सूर्य त्वचा का सबसे बड़ा दुश्मन है. शरीर के खुले भागों पर एक अच्छा “सूर्य रोधक” लगाना चाहिए. जब भी आप धूप  में जायें तो पूरी बाजू के हलके रंगों वाले सूती कपडे पहनने चाहिए. टोपी और धूप में पहना जाने वाला चश्मा पहनना ना भूलें. एक गिलास पानी में चन्दन का चूर्ण घोलें और उसे रेफ्रिजरेटर में ठंडा होने के लिए रख दें. इसे छिड़काव करने वाले बर्तन में डालें और जब भी आपको महसूस हो कि आपकी त्वचा में धूप से कोई समस्या हुई है तो उस पर इस पानी का छिड़काव कीजिये.

मौसमी परिवर्तन:

जब भी वातावरण गर्म और नमी युक्त होता है तो पसीने के कारण त्वचा में चिपचिपाहट महसूस होती है. गीली त्वचा में रोगाणुओं की गतिविधियाँ बढ़ जाती हैं. इन गतिविधियों को कम करने और त्वचा को साफ़ रखने के लिए प्रतिदिन स्नान करना चाहिए. रीठा, बेसन और चन्दन के पाउडर को मिलाकर स्क्रब बनाकर त्वचा पर मलना चाहिए. घर में बना हुआ जई का स्क्रब भी धूप की झुलसन को शांत करने और त्वचा की चमक बढ़ाने में सहायक है. पसीने से होने वाले द्रव के नुकसान को पूरा करने के लिए खूब सारा पानी पीना चाहिए.

जब मौसम ठंडा होता है तब त्वचा में नमी का स्तर कम हो जाता है और त्वचा रुखी हो जाती है  और फटने लगती है. पूरे शरीर पर मोइश्चराइसजिंग (नमी प्रदान करने वाला) लोशन लगाना चाहिए. त्वचा पर ग्वारपाठे यानि एलोवीरा का ताज़ा रस लगाने से भी त्वचा की नमी बनी रहती है. सप्ताह में एक बार शरीर पर तिल के तेल की मालिश कीजिये. हमेशा सूती गर्म कपडे और मोज़े पहनिये. पैरों की हल्के गर्म तिल के तेल या अरंड के तेल से नियमित मालिश करने से उन्हें फटने (बिवाइयों) और सोरायसिस से बचाया जा सकता है. रूखेपन से बचने और त्वचा के जल स्तर को सही बनाए रखने के लिए बहुत सारा कुनकुना गर्म पानी पीना चाहिए.

वायु प्रदुषण:

धूल, धुआँ, गन्दगी जैसे वायु प्रदूषक रोम छिद्रों को बंद कर देते हैं जिसके कारण कील और मुंहासे होते हैं. किसी अच्छे मोश्चाराइज़र का प्रयोग करना चाहिए जो त्वचा और प्रदूषक के मध्य एक सुरक्षा परत बना सके. जब आप घर वापस आयें तो त्वचा को सावधानी पूर्वक साफ़ करना चाहिए. गर्मियों में बेसन और गुलाब जल का प्रयोग स्क्रब के रूप में करना चाहिए. सर्दियों में मसूर की दाल का पाउडर और दूध के मिश्रण से बना स्क्रब श्रेष्ठ रहता है.

नींद :

नींद में कमी के कारण आँखों के नीचे काले घेरे हो जाते हैं. 7-8 घंटे की नींद त्वचा को स्वस्थ्य और चमकदार बनाती है.

व्यायाम :

रोजाना 45 मिनिट तेज़ कदमों से चलने से रक्त संचरण तेज़ होता है, त्वचा के विजातीय द्रव्य बाहर निकलते हैं और त्वचा स्वस्थ्य होती है. व्यायाम की कमी के कारण त्वचा मुरझा जाती है.

तनाव :

तनाव के कारण आँखों के नीचे काले घेरे, रंगत में कमी और चेहरे की त्वचा पर बारीक रेखाएं आ जाती हैं. योग, ध्यान, व्यायाम, और शरीर की मालिश तनाव कम करने और त्वचा को स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए उपयुक्त उपाय हैं.

व्यसन :

तम्बाकू, नशीले पदार्थ, शराब आदि त्वचा को निर्जीव और अनाकर्षक बनाते हैं. तम्बाकू, शराब अथवा किसी भी दुर्व्यसन से दूर रहिये.

आहार :

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अस्वास्थ्यकर भोजन त्वचा को ख़राब करता हैं. जंक, तैलीय और मसालेदार भोजन कील-मुंहासो और ब्लेक हेड का कारण है और त्वचा की सुन्दरता को नष्ट करता है. स्वास्थ्यकर भोजन त्वचा की आयु वृद्धि दर को कम करता है और उसे चमकदार बनाता है. नीचे दिए गए निर्देश आपको स्वास्थ्यपरक आहार लेने में सहायता करेंगे.

  1. प्रतिदिन कम से कम 2-3 लीटर साफ़ और ताज़ा पानी पीना चाहिए. यह आपके शरीर से विजातीय और विषैले द्रव्यों को बाहर निकालने में सहायक है और कब्ज को दूर रखता है.
  2. आपके आहार का बड़ा भाग फल और सब्जियां होनी चाहिए. गहरे हरे और नारंगी रंग के फल और सब्जियों में एंटी ऑक्सीडेंट  और केंसर  से लड़ने के गुण होते हैं.
  3. मिठाइयो, जंक फ़ूड, चोकलेट, तले हुए तैलीय और मसालेदार भोजन से दूर रहिये.

सुन्दर त्वचा के लिए दैनिक और साप्ताहिक कार्यक्रम

  1. प्रतिदिन स्नान कीजिये.
  2. प्रतिदिन दिन में दो बार आपका चेहरा किसी प्राकृतिक स्क्रब जैसे बेसन, मैथी पाउडर, हरे चने का आटा आदि से धोइए. धोने के बाद आपके चेहरे पर साफ़ पानी के छींटे डालिए.
  3. सप्ताह में एक बार अरंड के तेल से अपने शरीर की मालिश कीजिये.
  4. प्रतिदिन 15 मिनिट प्राणायाम करने से त्वचा स्वस्थ्य और चमकदार बनती है.
  5. सप्ताह में एक बार प्राकृतिक चीजों जैसे ताज़ी हर्ब, फल और सब्जियों आदि से फेशियल कीजिये. खीरा, गाजर, तरबूज, चन्दन का लेप, शहद आदि का मौसम के अनुसार प्रयोग किया जा सकता है.
  6. सुबह खाली पेट एक गिलास पानी में एक चम्मच शहद डाल कर पीना चाहिए. यह आपके दैनिक नियम का एक महत्वपूर्ण भाग होना चाहिए.
  7. दूध, दही और छाछ का प्रयोग कीजिये.
  8. आयुर्वेदिक वैद्य ताज़गी भरी और स्वस्थ्य त्वचा के लिए  खजूर, किशमिश, अखरोट , जैसे  सूखे मेवे, लेने की सलाह देते है

 

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